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“मन्नत का कफ़्फ़ारा, क़सम का कफ़्फ़ारा ही है।”
“मन्नत का कफ़्फ़ारा, क़सम का कफ़्फ़ारा ही है।”
उक़बा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “मन्नत का कफ़्फ़ारा, क़सम का कफ़्फ़ारा ही है।”
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अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि अनिर्धारित नज़्र का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित), जब उसे निर्धारित न किया गया हो और न उसका नाम लिया गया हो, क़सम का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) है।فوائد الحديث
नज़्र : शरीयत की परिभाषा में : शरई आदेशों एवं निर्देशों के पालन पर बाध्य व्यक्ति का अपनी इच्छा से अपने ऊपर किसी चीज़ को अल्लाह के लिए अनिवार्य कर लेना।
शपथ का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) : दस निर्धनों को भोजन कराना, उन्हें कपड़े देना अथवा एक दास मुक्त करना। यदि वह ऐसा न कर सके, तो तीन दिन के रोज़े रखे।
कफ़्फ़ारा के अंदर हिकमत यह है कि मुसलमान मन्नत (नज़्र) का सम्मान करे, उसमें दोबारा न पड़े और उसे अपनी ज़बान पर बार-बार न लाए।
नज़्र के प्रकार : 1. नज़्र-ए-मुतलक़ (सामान्य नज़्र) : जैसे कोई कहे : "अगर मैं स्वस्थ हो गया तो मुझ पर अल्लाह के लिए एक नज़्र है" और चुप हो जाए तथा किसी विशेष नज़्र की नीयत न करे, तो स्वस्थ होने पर उसपर क़सम का कफ़्फ़ारा अनिवार्य होगा। 2. नज़्र-ए-लजाज व गज़ब (ज़िद और गुस्से की नज़्र) : यह वह नज़्र है जिसे किसी शर्त के साथ जोड़ा जाए, जिसका उद्देश्य किसी काम को करने से रोकना हो या किसी काम को करने पर मजबूर करना हो, जैसे कोई कहे : "अगर मैंने तुमसे बात की तो मुझपर एक महीने के रोज़े हैं।" इसका हुक्म यह है कि वह या तो अपने वचन का पालन करे या फिर बात करता है तो क़सम का कफ़्फ़ारा दे। 3. नज़्र-ए-मुबाह (जायज़ काम की नज़्र) : जैसे कोई कहे : "मुझपर अल्लाह के लिए अपने कपड़े पहनना अनिवार्य है।" इसका हुक्म यह है कि उसे कपड़े पहनने या क़सम का कफ़्फ़ारा देने के बीच विकल्प दिया जाएगा। 4. नज़्र-ए-मकरूह (नापसंदीदा काम की नज़्र) : जैसे कोई कहे : मुझपर अल्लाह के लिए अपनी पत्नी को तलाक़ देना अनिवार्य है।" इसका हुक्म यह है कि उसके लिए सुन्नत यह है कि वह क़सम का कफ़्फ़ारा दे और जो नज़्र मानी है उसे न करे। यदि उसे कर लेता है तो उसपर कोई कफ़्फ़ारा नहीं है। 5. नज़्र-ए-मासियत (गुनाह के काम की नज़्र) : जैसे कोई कहे : "मुझ पर अल्लाह के लिए चोरी करना अनिवार्य है।" इसका हुक्म यह है कि नज़्र को पूरा करना हराम है और नज़्र मानने वाला क़सम का कफ़्फ़ारा दे। यदि वह उसे कर लेता है तो वह गुनाहगार होगा और उसपर कोई कफ़्फ़ारा नहीं है। 6. नज़्र-ए-ताअत (आज्ञापालन की नज़्र): जैसे कोई कहे : "मुझ पर अल्लाह के लिए इतनी नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है" अल्लाह का सामीप्य प्राप्त करने के इरादे से, यदि वह इसे किसी शर्त से जोड़ता है, जैसे किसी बीमार के ठीक होने से, तो शर्त पूरी होने पर उसे पूरा करना वाजिब होगा, और यदि इसे किसी शर्त से नहीं जोड़ता है, तो उसे हर हाल में पूरा करना वाजिब होगा।
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क़समें और सन्नतें