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1- अल्लाह के नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक व्यक्ति को कुरबानी का ऊँट हाँककर ले जाते देखा, तो कहा कि उसपर सवार हो जा। उसने कहाः यह तो कुरबानी का जानवर है। आप ने कहाः सवार हो जा।
2- एक व्यक्ति जुमा के दिन दारुल क़ज़ा (उमर- रज़ियल्लाहु अन्हु- के घर, जो उनकी मृत्यु के बाद उनके कर्ज़ की भुगतान के लिए बिक गया था) की दिशा में स्थित द्वार से मस्जिद के अंदर आया। रसूलुल्लाह- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उस समय खड़े ख़ुतबा दे रहे थे।
3- मैंने मुहम्मद- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़ को ध्यान से देखा, तो पाया कि आपका क़याम, रुकू, रुकू के बाद सीधे खड़ा होना, सजदा, दो सजदों के बीच बैठना, उसके बाद का सजदा और सलाम एवं नमाज़ के स्थान से निकलने के बीच का अंतराल, यह सब लगभग बराबर होते थे।
4- एक व्यक्ति अरफ़ा में ठहरा हुआ था कि अचानक अपने ऊँट से गिर पड़ा और उस की गरदन टूट गई। अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने कहाः "इसे पानी और बेर के पत्तों से स्नान कराओ और उसे उसीके दो कपड़ों का कफ़न पहना दो। उसे न खुशबू लगाओ और न उसका सिर ढाँपो। क्योंकि उसे क़यामत के दिन इस हाल में उठाया जाएगा कि वह 'तलबिया' कह रहा होगा।"
5- उहुद के दिन एक आदमी ने नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहाः आप क्या कहते हैं कि अगर मैं शहीद हो गया, तो कहाँ रहूँगा? आपने कहाः "जन्नत में।" यह सुनकर उसने वह खजूरें फेंक दीं, जो उसके हाथ में थीं और लड़ने लगा, यहाँ तक कि शहीद हो गया।
6- अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उमामा बिंत ज़ैनब (अपनी नातिन) को उठाए हुए नमाज़ पढ़ लेते थे।
7- हमें जनाज़े के पीछे चलने से मना किया गया है, लेकिन इस मामले में हमपर सख़्ती नहीं बरती गई है।
8- बेशक अल्लाह ही के लिए है, जो उसने ले लिया और उसी का है, जो उसने दिया। उसके समीप प्रत्येक वस्तु का समय निश्चित है। अतः अब तू सब्र कर तथा अल्लाह से प्रतिफल की उम्मीद रख।
9- सब्र तो मुसीबत के शुरू में करना होता है।
10- बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) को आदेश दिया गया था कि वह अज़ान के शब्द दो-दो बार कहें और इक़ामत के शब्द एक-एक बार।
11- खड़े हो जाओ, मैं तुम्हें नमाज़ पढ़ाता हूँ।
12- जब तुममें से किसी की पत्नी उससे मस्जिद जाने की अनुमति माँगे, तो वह उसे न रोके।
13- मैंने अबू बक्र, उमर तथा उसमान के साथ नमाज़ पढ़ी, लेकिन उनमें से किसी को "بسم الله الرحمن الرحيم" पढ़ते नहीं सुना।
14- ऐ अल्लाह के रसूल, अल्लाह हक़ बात से शर्माता नहीं है। यदि स्त्री का स्वप्नदोष हो जाए, तो क्या उसपर स्नान है? अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः हाँ, यदि उसे पानी (वीर्य) दिखाई दे।
15- जो इन पुत्रियों के द्वारा कुछ आज़माया जाए, फिर वह उनके साथ अच्छा व्यवहार करे, तो वे उनके लिए जहन्नम की आग से बचाव का माध्यम बन जाएँगी।
16- क़यामत के दिन मोमिन का ज़ेवर वहाँ तक पहुँचेगा, जहाँ तक वज़ू का पानी का पहुँचेगा।
17- मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कपड़े से जनाबत को धो देती, फिर आप नमाज़ के लिए नकल जाते, जबकि पानी का निशान आपके कपड़े पर दिखाई पड़ता।
18- नबी (सल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम) किसी नफ़ल नमाज़ की उतनी पाबंदी नहीं करते थे, जितनी फ़ज्र की दो रकातों की करते थे।
19- जमात के साथ पढ़ी गई नमाज़ अकेले पढ़ी गई नमाज़ के मुक़ाबले में सत्ताईस दरजा श्रेष्ठ है।
20- क्या बात है कि माहवारी वाली स्त्री छूटे हुए रोज़े बाद में रख लेती है, लेकिन छूटी हुई नमाज़ें बाद में नहीं पढ़ती? उन्होंने कहाः क्या तू हरूरिया है? मैंने कहाः नहीं, मैं हरूरिया तो नहीं हूँ, लेकिन पूछ्ना चाहती हूँ। तब उन्होंने कहाः हमें इस स्थिति से गुज़रना पड़ता, तो हमें छूटे हुए रोज़ों को बाद रख लेने का आदेश दिया जाता, लेकिन छूटी हुई नमाज़ों को बाद में पढ़ने का आदेश नहीं दिया जाता था।
21- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने सर पर तीन बार पानी डालते थे।
22- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मेरी गोद में टेक लगाकर क़ुरआन पढ़ा करते थे, जबकि मैं मासिक धर्म के समय में होती थी।
23- आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ज़ुहर की नमाज़ तेज़ धूप में पढ़ते थे, अस्र की नमाज़ ऐसे समय पढ़ते थे जब सूरज साफ़ और रौशन रहता था, मगरिब की नमाज सूरज डूबने के बाद पढ़ते थे।
24- अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास एक बच्चा लाया गया, जिसने आपके कपड़े पर पेशाब कर दिया तो आपने पानी मँगवाकर पेशाब पर बहा दिया।
25- मैं अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया। उस समय आप चमड़े से बने हुए लाल खेमें में थे। उनका कहना है कि इसी बीच बिलाल- रज़ियल्लाहु अन्हु- वज़ू का पानी लेकर निकले तो कोई आपके शरीर के अंगों से गिरने वाले पानी को अपने ऊपर छिड़क रहा था और कोई ले रहा था।
26- जब पुरुष, स्त्री की चार शाखाओं के बीच बैठ जाए और उसको भैंचे तो स्नान आवश्यक हो जाता है।
27- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फज्र की नमाज़ पढ़ते तो आप के साथ मोमिन महीलाएँ, चादर ओढ़ कर नमाज़ के लिए आती थीं। फिर जब वापस जातीं तो कोई भी अंधेरा होने के कारण उन्हें नहीं पहचान पाता था।
28- ऐ इसमाईल की संतान! तीरंदाज़ी करो; क्योंकि तुम्हारे पिता इसमाईल तीरंदाज़ थे।
29- सबसे उत्तम दान, अल्लाह की राह में टेंट की छाया उपलब्ध कराना, अल्लाह की राह में सेवक प्रदान करना या अल्लाह की राह में जवान मादा ऊँटनी देना है।
30- इसने कार्य थोड़ा किया और प्रतिफल बड़ा प्रदान किया गया।
31- मैंने तुम्हें मिसवाक के प्रति बहुत ज़्यादा कहा है।
32- कोई वस्तु माँगने में हद से ज्यादा आग्रह मत करो। क्योंकि तुममें से कोई व्यक्ति जब मुझसे कोई चीज़ माँगता है और मुझे पसंद न होेने के बावजूद उसका सवाल मुझेस कोई वस्तु निकाल लेता है, तो मेरी दी हुई चीज़ में बरकत नहीं दी जाती।
33- घोड़े के माथे की लट से क़यामत के दिन तक भलाई बाँध दी गई है
34- अल्लाह, शहीद के हर गुनाह को, क़र्ज़ के सिवा, क्षमा कर देगा
35- ऊपर वाला हाथ नीचे वाले हाथ से बेहतर है। ऊपर वाला हाथ खर्च करने वाला हाथ है और नीचे वाला हाथ माँगने वाला हाथ है
36- तो सुनो, उसका धन वह है, जो उसने आगे भेज दिया और उसके वारिस का धन वह है, जो उसने पीछे छोड़ दिया
37- सुबह से पहले वित्र पढ़ने में जल्दी करो
38- बनू सलमा! तुम अपने अस्ल घरों ही में रहो, तुम्हारे क़दमों के निशान लिखे जाएँगे। तुम अपने अस्ल घरों ही में रहो, तुम्हारे क़दमों के निशान लिखे जाएँगे।
39- अल्लाह के रास्ते में युद्ध करो क्योंकि जिसने दो-एक क्षणों के लिए भी अल्लाह के रास्ते में युद्ध किया, उसके लिए जन्नत वाजिब हो गई
40- जब तुममें से कोई रात को नमाज़ पढ़ने के लिए उठे और उसकी ज़बान पर क़ुरआन ठीक से न आ रहा हो और उसे पता न चल रहा हो कि क्या कुछ पढ़ रहा है, तो सो जाए
41- जन्नत में एक द्वार है, जिसे रय्यान कहा जाता है। क़यामत के दिन उससे रोज़ेदार प्रवेश करेंगे। उनके सिवा कोई उस द्वार से प्रवेश नहीं करेगा। कहा जाएगाः रोज़ेदार कहाँ हैं? अतः, वे उठ खड़े होंगे। उनके सिवा कोई उससे प्रवेश न करेगा। जब वे दाख़िल हो जाएँगे, तो द्वार बंद कर दिया जाएगा और उससे कोई अंदर न आएगा।
42- अल्लाह मूसा पर दया करे, उन्हें इससे भी अधिक कष्ट दिया गया, परन्तु सब्र से काम लिया
43- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) किसी महीने में रोज़ा न रखते, यहाँ तक कि हम सोचने लगते कि इस महीने में रोज़ा रखेंगे ही नहीं और किसी महीने में रोज़ा रखते जाते, यहाँ तक कि हमें लगने लगता कि इस महीने में रोज़ा छोड़ेंगे ही नहीं। तथा तुम उनको रात में नमाज़ पढ़ते हुए देखना चाहते तो देख लेते और सोते हुए देखना चाहते तो भी देख लेते।
44- ईर्ष्या, केवल दो प्रकार के लोगों से रखना जायज़ है; एक वह व्यक्ति, जिसे अल्लाह ने धन प्रदान किया हो तथा उसने उस धन को सत्य के मार्ग में खर्च करने पर लगा दिया हो तथा दूसरा वह व्यक्ति, जिसे अल्लाह ने अंतर्ज्ञान प्रदान किया हो और वह उसी के अनुसार निर्णय करता हो और उसकी शिक्षा देता हो।
45- अल्लाह के भय से रोने वाला व्यक्ति उसी प्रकार जहन्नम में प्रवेश नहीं कर सकता, जिस प्रकार दूध थन में लौट नहीं सकता।
46- कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है जो जन्नत में प्रवेश करने के बाद दुनिया की ओर लौटना चाहेगा, चाहे उसे धरती की सारी वस्तुएँ मिल जाएँ। हाँ, मगर शहीद की बात और है। वह (शहादत का) सम्मान देखकर कामना करेगा कि दोबारा दुनिया की ओर वापस जाए और दस बार क़त्ल किया जाए।
47- अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने वाले की मिसाल उस व्यक्ति की तरह है, जो उसके अल्लाह के मार्ग में जिहाद से वापस आने तक लगातार रोज़ा रखे, नमाज़ पढ़े और क़ुरआन पढ़ता रहे तथा रोज़ा एवं नमाज़ से थकावट महसूस ना करे।
48- जिसने अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए एक घोड़ा सुरक्षित रखा तथा ऐसा अल्लाह पर ईमान और उसके वचन को सच मानते हुए किया तो क़यामत के दिन उसे उसके खाने, पीने और पेशाब तथा गोबर, हर चीज़ का प्रतिफल मिलेगा।
49- जिसने अल्लाह के मार्ग में एक तीर चलाया, वह उसके लिए एक गुलाम आजाद करने के बराबर है।
50- जिस मुसलमान ने अल्लाह के मार्ग में तनिक समय तक भी अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया, उसके लिए जन्नत अनिवार्य हो गई और जो अल्लाह की राह में ज़ख़्मी हुआ या चोट खाई, उसके ज़ख़्म से क़यामत के दिन भारी मात्रा में रक्तस्राव हो रहा होगा, जिसका रंग केसर के जैसा होगा और सुगंध कस्तूरी जैसी।
51- अब्दुल्लाह अच्छा आदमी है अगर वह रात को नमाज़ पढ़ता।
52- कदापि नहीं, मैंने उसे एक धारीदार कपड़े अथवा चोगे के कारण जहन्नम की आग में जलते हुए देखा है, जिसे उसने ग़नीमत के धन से, बँटवारे से पहले ले लिया था।
53- सबसे बड़ा प्रतिफल वाला सदक़ा कौन-सा है? आपने फरमायाः वह सदक़ा, जो तुम उस समय करो, जब तुम सेहतमंद एवं लोभी हो; तुम्हें निर्धन हो जाने का डर सताए और मालदारी की आशा रखो। देखो, इतनी देर न करो कि जब प्राण गले तक पहुँच जाएँ तो कहने लगो कि उमुक के लिए इतना है और अमुक के लिए इतना है। हालाँकि वह अमुक का हो ही चुका है।
54- आज रोज़ा न रखने वाले नेकी ले गए।
55- अब्दुल्लाह बिन मसऊद- रज़ियल्लाहु अन्हु- काबे को बाएँ और मिना को दाएँ करके खड़े हुए और फ़रमायाः यही वह स्थान है, जहाँ अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर सूरा अल-बक़रा उतरी थी।
56- ऐ अंसारियो! क्या मैंने तुम्हें सत्य की राह से भटका हुआ नहीं पाया तो अल्लाह ने तुम्हें मेरे द्वारा सीधा रास्ता दिखाया? तुम बिखरे हुए नहीं थे कि अल्लाह ने तुम्हें मेरे द्वारा आपस में जोड़ दिया? तुम कंगाल नहीं थे कि अल्लाह ने तुम्हें मेरे द्वारा धनी बनाया?
57- जिसने मेरे साथ अब तक ऐतिकाफ़ किया , वह अंतिम दस दिनों का भी ऐतिकाफ़ करे, क्योंकि मुझे यह रात दिखाई गई और फ़िर भुला दी गई। मैंने उस रात की सुब्ह को देखा कि मैं पानी और मिट्टी पर सजदा कर रहा हूँ। अतः, उसे अंतिम दस रातों में तलाश करो।
58- तुम अल्लाह की ओर से मिली हुई छूट को स्वीकार करो।
59- हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ रमज़ान के महीने में सख्त गर्मी के समय एक यात्रा पर निकले। स्थिति यह थी कि सख्त गर्मी के कारण, हम अपने सिर पर अपना हाथ रख लिया करते थे। उस समय, हमारे बीच अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और अब्दुल्लाह बिन रवाहा- रज़ियल्लाहु अन्हु- के सिवा कोई रोज़े से नहीं था।
60- मुसलमान को उसके घोड़े और गुलाम की ज़कात नहीं देनी है।
61- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने निरंतर रोज़ा रखने से मना किया है। लोगों ने कहा कि आप तो निरंतर रोज़े रखते हैं? आपने फ़रमाया: मैं तुम्हरे जैसा नहीं हूँ। मुझे खिलाया और पिलाया जाता है।
62- क्या अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने विशेष रूप से शुक्रवार के दिन का रोज़ा रखने से मना किया है? तो फ़रमायाः हाँ।
63- जो रोज़ा बाक़ी छोड़कर मर जाए, उसका वली (अभिभावक या करीबी रिश्तेदार) उसकी ओर से रोज़ा रखेगा।
64- मेरी माँ मर गई है और उसपर एक महीने का रोज़ा है, ऐसे में क्या मैं उसकी तरफ़ से रोज़ा रख लूँ? आपने फ़रमायाः यदि तेरी माँ पर क़र्ज होता तो क्या तू उसकी ओर से उसे अदा करता? उसने कहाः ज़रूर! तो फ़रमायाः फिर तो अल्लाह का क़र्ज इस बात का अधिक हक़दार है कि उसे अदा किया जाए।
65- मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अरफ़ात में प्रवचन देने के दौरान (एहराम वाले व्यक्ति के बारे में) कहते हुए सुनाः जो जूता न पाए, वह मोज़ा पहन ले और जो तहबंद न पाए, वह पाज़ामा पहन ले।
66- जानवरों से होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति नहीं है, कुएँ में गिरने से होने वाली क्षति की क्षितपूर्ति नहीं है, खान में काम करते समय होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति नहीं है तथा ज़मीन में दफ़न ख़ज़ाने का पाँचावाँ भाग देना है।
67- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और आपके सहाबा चार ज़िल-हिज्जा की सुब्ह को मक्का पहुँचे तो आपने उन्हें आदेश दिया कि हज के एहराम को उमरा का एहराम बना लें (और उमरा के बाद हलाल हो जाएँ)। ऐसे में उन्होंने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! हमारे लिए कौन-कौन सी वस्तुएँ हलाल होंगी? तो आपने उत्तर दियाः तमाम वस्तुएँ हलाल हैं।
68- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब अरफ़ा से मुज़दलिफ़ा की ओर चले तो किस गति से चल रहे थे? उन्होंने उत्तर दियाः मध्यम गति से चल रहे थे, लेकिन जब खाली जगह मिलती थी तो तेज़ चल लेते थे।
69- अल्लाह के निकट सबसे प्रिय रोज़ा दाऊद- अलैहिस्सलाम- का रोज़ा और सबसे प्रिय नमाज़ दाऊद- अलैहिस्सलाम- की नमाज़ है। आप आधी रात सोते, फिर एक तिहाई रात नमाज़ पढ़ते और शेष छठा भाग सोते थे। इसी तरह एक दिन रोज़ा रखते और एक दिन बिना रोज़े के रहते थे।
70- मेरे भाई दाऊद के रोज़े (आधे साल के रोज़े) से बढ़कर कोई रोज़ा नहीं है। एक दिन रोज़ा रखो और एक दिन बिना रोज़े के रहो।
71- पाँच प्रकार के जीव-जन्तु हानिकारक हैं, उन्हें हरम के अंदर भी मारा जाएगा, कौआ, चील, बिच्छू, चूहा और काटने वाला कुत्ता।
72- न कमीज पहने, न साफ़े बाँधे, न पाजामे पहने, न सरपोश वाला जामा पहने और न मोज़ा पहने। हाँ, यदि किसी के पास जूते न हों तो मोज़े पहन सकता है, लेकिन उन्हें टखनों के नीचे तक काट ले।
73- अगर मुझे पहले वह बात मालूम हो गई होती, जो बाद में मालूम हुई, तो मैं साथ में क़ुरबानी का जानवर न लाता तथा यदि मैं क़ुरबानी का जानवर न लाया होता, तो हलाल हो जाता।
74- आप हमें आदेश देते थे कि जब हम सफ़र में हों तो तीन दिन और तीन रात पेशाब, पाखाना और नींद के बाद अपने मोज़े न उतारें। हाँ, मगर जनाबत की बात और है।
75- ऐ यज़ीद! तेरे लिए वही है, जिसकी तूने नीयत की और ऐ मअन! तेरे लिए वह है, जो तूने लिया।
76- मेरे आगे मेरी उम्मत के अच्छे और बुरे सब कर्म पेश किए गए। तो मैंने उसके अच्छे कर्मों से रास्ते से कष्टदायक वस्तु का हटाना भी पाया और उसके बुरे कर्मों में वह थूक भी पाया, जो मस्जिद में फेंका गया हो और उसे साफ़ न किया गया हो।
77- अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रात में इतनी देर तक नमाज़ में खड़े रहते कि आपके दोनों पाँव सूज जाते थे।
78- अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने नज्जाशी के ज़नाज़े की नमाज़ पढ़ी और मैं दूसरी अथवा तीसरी पंक्ति में था।
79- अल्लाह के निकट सबसे प्रिय स्थान मस्जिदें और सबसे अप्रिय स्थान, बाज़ार हैं।
80- युद्ध धोखा है।
81- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में हमें इस तरह का खाना कम ही मिला करता था। जब हमें इस तरह का खाना मिलता, तो हमारे पास रूमाल नहीं होते, अतः अपनी हथेलियों, बाज़ुओं और क़दमों में पोंछ लेते और फिर वज़ू किए बिना ही नमाज़ पढ़ लेते।
82- ऐ अल्लाह, हमारे जीवित तथा मृत, छोटे तथा बड़े, पुरुष तथा स्त्री और उपस्थित तथा अनुपस्थित सबको क्षमा कर दे। ऐ अल्लाह, हममें से जिसे जीवित रखना हो, इसलाम पर जीवित रख और हममें से जिसे मारना हो, उसे ईमान की अवस्था में मौत दे।ऐ अल्लाह, हमें उसके प्रतिफल से वंचित न कर और हमें उसके बाद आज़माइश में न डाल।
83- ऐ अल्लाह, अमुक पुत्र अमुक तेरी शरण तथा तेरी सुरक्षा में है। अतः उसे क़ब्र की आज़माइश और आग के अज़ाब से बचा। तू दाता और प्रशंसायोग्य है। ऐ अल्लाह, इसे क्षमा कर दे और इसपर दया कर। निश्चय ही तू अति क्षमाशील और दयावान है।
84- आँखें आँसू बहा रही हैं और दिल शोकाकुुल है, लेकिन हम वही कहते हैं, जो हमारे रब को पसंद हो और ऐ इबराहीम, हम तेरी जुदाई से दुखी हैं।
85- नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जुमा के दिन ख़ुतबा दे रहे थे कि एक व्यक्ति अंदर आया। आपने कहाः "ऐ अमुक क्या तूने नमाज़ पढ़ ली है?" उसने कहाः नहीं। फ़रमायाः "खड़े हो जाओ और दो रकात पढ़ लो।"
86- मुझे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चुनांचे आप सफ़र में दो रकात से अधिक नहीं पढ़ते थे तथा अबू बक्र, उमर और उसमान भी ऐसा ही करते थे।
87- मैंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पीछे एक ऐसी स्त्री की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी, जो निफ़ास (वह प्राकृतिक रक्त, जो प्रसव के बाद निकलता है) की अवधि में मर गई थी, तो आप उसके बीच में खड़े हुए।
88- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक व्यक्ति को एक सैन्यदल का अमीर बनाकर भेजा। वह अपने साथियों को नमाज़ पढ़ाते समय कुरआन पढ़ता, तो अंत में "قل هو الله أحد" पढ़ता।
89- सूरज और चाँद अल्लाह की निशानियों में से दो निशानियाँ हैं। उन्हें ग्रहण किसी व्यक्ति की मौत और जीवन के लिए नहीं लगता। अतः, जब तुम ऐसा होता देखो तो अल्लाह से दुआ करो, तकबीर कहो, नमाज़ पढ़ो और सदक़ा करो।
90- मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहे व सल्लम) के सामने सोए रहती और मेरे दोनों पैर आपके किबले की ओर होते। जब आप सजदे में जाते, तो धीरे से मेरे शरीर पर ऊँगली चुभाते और मैं अपने पैर समेट लेती। फिर जब खड़े होते, तो मैं पैर फैलाते लेती। उन दिनों घरों में दिए नहीं होते थे।
91- नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) वृष्टि माँगने के लिए नमाज़ पढ़ने को निकले, तो क़िबले की ओर मुँह करके दुआ की, अपनी चादर पलटी और फिर दो रकात नमाज़ पढ़ी, जिसमें ऊँची आवाज़ में तिलावत की।
92- मैं और इमरान बिन हुसैन ने अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहुम) के पीछे नमाज़ पढ़ी। जब वह सजदे में जाते, तो तकबीर कहते, जब सर उठाते, तो तकबीर कहते और जब दूसरी रकात के बाद खड़े होते, तो तकबीर कहते।
93- अल्लाह केरसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सफ़ेद यमनी कपड़ों में कफ़नाया गया। उनमें न कुर्ता था और न पगड़ी थी।
94- मैंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मग़रिब की नमाज़ में सूरा-ए-तूर पढ़ते सुना।
95- नबी (सल्लल्लाहु अलैहे व सल्लम), अबू बक्र एवं उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) दोनों की ईद की नमाज़ें ख़तबे से पहले पढ़ते थे।
96- अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) यात्रा के दौरान जब चल रहे होते, तो जोहर और अस्र की नमाज़ों को एक साथ पढ़ते तथा मग़रिब और इशा की नमाज़ों को एक साथ पढ़ते।
97- खाओ, पियो और दान करो। हाँ, मगर घमंड और फ़िज़ूलख़र्ची को राह न दो।
98- मैंने किसी इमाम के पीछे नमाज़ नहीं पढ़ी, जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से अधिक हल्की और संपूर्ण नमाज़ पढ़ाता हो।
99- मैं तुम्हें नमाज़ पढाऊँगा। हालाँकि मेरा नमाज़ पढ़ने का इरादा नहीं था। मैं दरअसल, नमाज़ पढ़के दिखाना चाहता हूँ कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कैसे नमाज़ पढ़ते देखा है।
100- तुम नमाज़ में سَبِّحِ اسم ربك الأعلى' ,'والشمس وَضُحَاهَا' और 'والليل إذا يغشى' जैसी सूरतें क्यों नहीं पढ़ते, क्योंकि तुम्हारे पीछे बड़े-बूढ़े, कमज़ोर और ज़रूरतमंद, हर तरह के लोग नमाज़ पढ़ते हैं?